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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

*** ...और मैं लिपटी रही ***


तेरी ग़ैरमौजूदगी में
कुछ ऐसी भी गुज़री हैं
मेरी कई सर्द ख़ामोश रातें
कि रुई के
बेपरवाह नर्म फाहों- सी
तेरे एहसास से ही मैं लिपटी रही।

जब पहली दफ़ा
तुम स्याह रात की सफ़ेद चाँदनी में
कभी बलखा के आए
मैं सहमती हुई अपने सारे ख़्वाब
सिरहाने लिए सोयी थी,
खोयी हुई थी मैं
तब तुम्हारी ही कोई ज़िन्दा जुस्तजू लेकर।

तुम आये
आकर मुझे हज़ारों रंगीन लम्हे दिये,
और मुहब्बत में डूबे
तुम्हारे दिलकश साथ को जिया।
तुमसे ही फिर
हज़ारों मौजूँ लफ़्ज़ माँगकर
मैं उधार की
कई कविताएँ लिखने लगी।

मुहब्बत ने कभी
तुम्हें छूकर क्या आज़माना चाहा
मैं तुम्हें
दूर तलक फिर कहीं ढूँढ नहीं पायी,
तुमने तो दुनिया को
अपनी नज़रों से देखने के रास्ते चुने,
और तुम चले गये
किसी लौटती पुरबाई की तरह,
मैं प्रेम में ठगी
वहीं अपनी दुनिया के निशान खोजती रही।

मैं मुहब्बत को
जी भरके जीना चाहती थी,
सो, तुमसे मिली
सारी वर्जनाएँ तोड़ देनी थीं मुझे,
पर मिल जाने की
सारी चाह मेरी रुसवा हो गयीं,
यूँकि तुमसे इतर,
तुम्हारी लगायी बंदिशें कभी भरम नहीं बनीं। ***
                - ©अमिय प्रसून मल्लिक

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