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रविवार, 4 नवंबर 2018

*** कितनी दूर हूँ...!***


जो समझते हैं
तुम्हारे क़रीब दिखना
मेरी मुहब्बत की निशानी रही है...

मेरे साथ चलते हुए
तुमने
प्यार की जब अमिट निशानियाँ छोड़ीं,
मैं बेपरवाह
तुम्हें जीत लेने की
आज इस नए शहर में भी अकेली ही मुनादी करती रही।
तुम आये तो,
ख़ुश्बू हवाओं में
और भी मदहोश हो रही थीं,
और उन्हें समेट लेने में
मैं खिलखिलाती हुई मानो पागल हुए जा रही थी।

मुझे
पहली दफ़ा छूकर
तुमने प्यार के सैकड़ों अबूझ मायने सिखाए,
और बताया कि
हो सकते हैं कभी भी, कहीं भी हज़ारों रास्ते
मुहब्बत से गुज़रते हुए, मुहब्बत को जताने के,
फिर मैं नज़रें झुकाए, घबरायी- सी तुमसे दूर जाना चाहती रही।

और,
इक अरसे के लिए
तुमसे इतनी दूर आकर भी तो
देखो,
तुम्हारे कितने क़रीब रही हूँ मैं! ***
           - © अमिय प्रसून मल्लिक.

शनिवार, 3 नवंबर 2018

*** जो तुम समझते... ***




कह सकता था,
तुम्हारे चले जाने पर
जाने कितनी ही अबूझ कविताएँ...

तुम होती,
तो लफ़्ज़ों का मिजाज़ भी होता
और
पास सिमट के
हम ज़िन्दगी जिये जाने के सारे हुनर
हँस के आज़माते,
नहीं तो
चुन- चुनकर सहेजे
इन एहसासों में रखा क्या है!

'गर तुम नहीं हो
तो तुम पर लिख दी
फिर हज़ार कविताओं का ही क्या होगा!***
                        
            - © अमिय प्रसून मल्लिक

***...और तुम चले गए ***



मैंने कहा,
प्यार नहीं करते मुझसे,
और तुम चुप रहे!

कहो,
अब जो तुम चले गए हो,
ये शामें
तुम्हारी बातों से सिन्दूरी थीं,
मेरी रातों में जो
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का हरदम पहरा घना रहा,
मेरे ख़ामोश दिन
जो
तुम्हारे मुस्कराने से
खिलखिला उठते थे फाकाकशी में भी,
कहाँ ढूँढूँ अब इन्हें मैं!

जाने आज कितनी दूर चले गए हो,
कब आओगे लौटकर,
जानता नहीं ये मन मेरा,
और
तुमसे अभी भी,
यही कहता है अकेले में ये दिल लाचार- सा,
कह दो, 
कि तुम नहीं जाओगे मुझे छोड़कर!

हाँ,
झूठ तो नहीं कहते कभी तुम,
पर, हो झूठे,
योंकि तुम तो कब का जा चुके हो।***
         
                  - © अमिय प्रसून मल्लिक

*** तुम्हारे जाने के बाद...***



सोचती हूँ,
बहुत कुछ बदल तो नहीं जाएगा!

तुमसे जो
मेरी रातें रोशन थीं,
बेतहाशा परेशान मेरे दिन में
जो तुम
हर पल उजाले जैसे थे,
उनको
मैं यहाँ अब अकेली
इतनी दूर से कैसे सहेजूँगी!

मैं कैसे भूलूंगी,
तुम्हारे साथ गुज़ारा हुआ
सौ- सौ बरस जैसा मेरा
एक भी लम्हा।

लौट आऊंगी फिर मैं,
अचानक,
लगता है, सब कुछ छोड़के
जो तुमसे दूर 'गर गुज़र न सके
सबसे लंबे
मेरे ये अनचाहे दिन।***

       
        - © अमिय प्रसून मल्लिक

*** साथ तुम्हारा...***



मैंने कहा,
अब चाय या कॉफ़ी कुछ लोगी!

जवाब आया,
कुछ नहीं लूँगी,
बस तुम पास बैठे रहो मेरे
मैं देखूंगी तुम्हें।

...चाय या कॉफ़ी ले लेती
तो जाने
क्या- क्या नहीं बन जाती ये! ***

              - © अमिय प्रसून मल्लिक.

*** कहो तो ज़रा...***



उसने कहा,
इधर- उधर न देखो,
बस प्यार करो!

कैसे करते हो कुछ,
क्या- क्या तब
जाने कैसे सोच पाते हो!
अच्छे बुरे की सारी परख
कैसे
अभी ही करते हो!

'प्यार नहीं करते तुम
कि जब
मैं तुम्हारा स्पर्श चाहती हूँ;
तुम
सुरक्षा के सवालों में मशगूल हो जाते हो!' ***

                   - © अमिय प्रसून मल्लिक.

*** 'तुम' ***



कविताएँ,
कभी भी लिखी जा सकती हैं
और उन्हें
पढ़ा भी जा सकता है
देर रात के स्याह सन्नाटे में!

बस,
वे 'तुम' पर लिखी जाएँ।***

            - © अमिय प्रसून मल्लिक

*** मैंने जाने दिया... ***




तुम शहर छोड़कर
जब चली गयी,
मैं निरा अकेला वहाँ सिगरेट की कशें ले रहा था।
मुझे लगा,
तुम्हारे ख़यालों में उलझकर
मैं हर चौक- चौराहे पर अपना एक ठौर बना लूंगा।

तुम्हें 'गर याद होगा,
तब,
जब मैं तुम्हें बिस्तर में क़ैद नहीं करना चाहता था,
और मेरी असंख्य सर्द रातों में
सैकड़ों झंझावात
मुझसे बेपरवाह रूबरू हो रहे थे,
मैंने तुम्हें जाने दिया...

मैंने जाने दिया कि
तेरे प्यार की अंगीठी में बेलौस
तब मेरा वर्चस्व सुलग रहा था,
और
इसी गुमान में हमारी
हज़ारों बेबस अंगड़ाइयाँ भी सेंकी गयीं।
मेरा मूक प्यार तब भी
तुम्हारे फिर नहीं 'होने' के साबूत साक्ष्य को
मिटाने में मशगूल था।

तुम्हारे चले जाने तक मेरी सारी रातें
तुम्हारी ही
बातें करती रहीं,
और तुम्हारे संग हर दिन
कभी न मिटानेवाली यादों का,
अमिट संसार गढ़ता रहा;
मैं तब भी नहीं ताड़ सका,
कि जितनी वर्जनाएँ तुमने संसार के साथ
मिलके रची हैं,
उनमें सिर्फ़ मेरा ख़ामोश प्यार ही क़ैद है।

इस शहर को
कहो, अब हुआ क्या है,
सब वही तो हैं,
फूल, पत्ती, सड़क, तारे, रात, जुगनू,
और जो नहीं है,
वो किसी चौक चौराहे पर कहीं,
तुम्हारी गंध है।
मैं उन्हीं कुछ गंधों के लिए
हर इस जगह को धुआँ- धुआँ- सा करता रहता हूँ
कि मैं आज जितना लज्जित होता जाऊँगा,
तुम सारी वर्जनाओं को तोड़कर
भरसक कोई मुकम्मल जगह बनाती चली जाओगी।

अब आज फिर मैं
तुम्हें अपने शहर में ढूँढ रहा था,
जहाँ तुम लौटकर कभी निभा सको उन्हें
जो मेरी हज़ार रातें
तुम्हारे बेतरतीब वायदों में क़ैद हैं,
पर
यहाँ उसी शहर की हर सड़क पे
तुम्हारे न 'होने' का कभी न मिटनेवाला
सन्नाटा भी पसरा हुआ था,

मैंने जब भी दुबारा प्रेम में पड़ना चाहा।***

                   --- © अमिय प्रसून मल्लिक​.

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

*** जो तुम्हारे पास रहा ! ***




उसूल पानी का
बहना ही अगर होता
जम जाने की फिर
क्या उसकी
कहीं ज़िद होती
देखा तुमने,
यकायक बदल गयी मैं
कि ज़िन्दगी कहाँ किसी की
हरदम
इक खाली मर्तबान रही है।

गिरे परदों के पीछे सही
हाँ, तुम्हारी छाया
कसमसाती रही है,
और बालकनी या
झीनी खिड़कियों से
तुम्हारी तड़प कूदना चाहती है
वही अकेलेपन का
स्वयं में
अनूठा अवसाद भोग के!

तुम्हीं चमकना,
शिथिल होती यादों में
और कभी न मिटनेवाली
सुलगती राख के सहारे
जहाँ
मेरे- तुम्हारे
सारे विवादास्पद मर्म
चिंघाड़ करेंगे
और
तड़पना फिर
उस बेचैन गौरेये की मानिंद
कि जो तुम्हारे पास
मेरे वहम के
आज भी दाने चुग रही है।

यों कि
तुम्हारा अपना रंग भी
एक कालिख है
और रुष्ठ हैं तुम्हारी
अपनी धड़कनें,
जिनका मोलभाव भी
किसी नीलामी का
कोई छद्म आकर्षण नहीं।

मानती हूँ,
ये राख फिर भभकेगी
पर जो उष्णता
भोगी है
कुलाँचे लेते
आज तुम्हारे झूठे अहम् ने,
वक़्त ने हमेशा ही वहाँ
अल्हड़पन के
अविराम पैबन्द लगा रखे हैं।***

   --- © अमिय प्रसून मल्लिक.

बुधवार, 23 मार्च 2016

*** आतुर यादें ***


प्रेमालाप में आतुर
वो बालमन
तब ही
यकायक युवा हो चला था
तुम्हारे संसर्ग मेँ रहकर
जब पहली बार
इक उष्णता महसूस हुई
और हुई थीं,
बेलगाम मन- अश्व को
सँवर जाने की
अकूत इच्छाएँ।

मेरी पहली कविता
तुम थी;
और तुमसे ही दूर रखकर
मैंने सैकड़ों रचनाएँ जनीं।
कविताओं के छद्म मर्म मेँ
मैं भूल गया
तुम पर लिखी जा रही
समस्त रचनाओं का
इक समर्पण होना चाहिए था।

अब जबकि
अपनी टूटती शिराओं में
मैंने तुम्हें
'दूरदर्शन' के सुनहरे दिनों- सा
यादों में ज़िन्दा रखा है,
तो स्याह- सफ़ेद रंगों से
कोई गुरेज़ भी नहीं।

हाँ, लहलहा उठती हैं
मेरे मन की
वो उदास होती घास
जब कोई प्रेम के
असंभाव्य बुलावे में
कहीं भक्क् से याद करता है,
तुम कहो न इनको
ख़ामोशी से;
सब समेटकर इक दफ़ा
ये बाँस बन जाए। ***

       --- अमिय प्रसून मल्लिक.

गुरुवार, 10 मार्च 2016

*** बदलाव ***

आती थी इक चिड़िया
रोज़ ही सवेरे
मेरी बालकनी में
और उसकी चहचहाट से ही
मेरे अख़बार का
हरदम आगाज़ हुआ था।

सैकड़ों ऐसी ख़बरें
जिनसे मेरी दिनचर्या
आहत होती थी
मैं उन्हेँ चाय की चुस्कियों संग
निगल जाने में
यकीन रखता था।

पर जो संभाव्य था,
एक दिन
चील का आना हुआ,
मेरे अख़बार मेँ नहीं,
उस फुदकती चिड़िया के
अकेले अहाते में
और 'चील- हरण' का
ऐसा वाक़या
उसी घिसे- पिटे अख़बार- सी
अपनी जवानी में
मैंने पहली बार पढ़ा।

मैं हैरान हुआ,
और बदलते वक़्त की
स्याह और खूँख्वार नज़ाकत को
समय से स्वीकारने की
अद्भुत कला सीखने में
गर्व से तल्लीन हो गया।

मेरा अख़बार पढ़ना
तब भी ज़ारी रहा,
और फिर न मेरी बालकनी में,
न किसी खिड़की में
उस जैसी किसी चिड़िया की
कोई आहट
कभी सुनी गयी।

हाँ, बदलते वक़्त के साथ
चिड़ियाँ भी
बदल जाती हैं।***

   --- अमिय प्रसून मल्लिक.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

*** अस्पृश्य पद्यांश ***


उसने प्रेम किया था,
या कि उसे प्रेम जैसी
किसी सकुचाती भावना का
पाठ्य में ही भान कराया गया।
उसे अब जो लगता है
वो तब उस अनुभूति से
कुछ और ही अलग था।

जब वो अकेली इन सबमें उलझी
किसी क्षितिज पर
गुत्थियों के सुलझने के
व्यर्थ वहम में थी,
और उसे वहीँ प्रेम सरीखी
किसी वस्तु का
बेसबब पाठ पढ़ाया जा रहा था।

उसने अपने टीचर को देखा,
और उसकी आँखों में
यदा- कदा अट्टहास करती हुई
उसे उसकी अटखेलियाँ दिखीं,
और कभी आर्तनाद करती हुई
उसकी वेदना चुभी
पर जो पनपना ज़रूरी था;
पथ भ्रष्ट होकर भी
वो प्रेम किसी अध्याय में
खोखले वायदों से ज़्यादा
कभी गोचर न हुआ।

वो हैरत में इस दफ़े
इसलिए आयी,
कि उसे अपनी आँखों से
अप्रत्याशित- सा
यह सम्मान मंज़ूर नहीं था
और वो हाजमे की गोली से इतर,
बिना चबाते हुए,
अक्षर को निगलने भर लगी।
यों कि,
उसकी रातें अब वीरान थीं,
और रातों में कोई बात थी।

मिलन- बिछोह की इस पहेली में
वो इक मुक़म्मल उम्र तक
अकेली ही उलझती रही,
फिर उसकी रातें ख़ुद से
न कभी स्याह हुईं
और न दिन के उजास में
ख़ुद से कभी उसने
कोई साक्षात्कार ही किया।
उसके ढेरों रास्ते
चुने उसने अपनी ही रवानियों में
पर उनके सँवर जाने की
हर कोशिश ख़ुद ही
उसकी ज़िन्दादिली लीलती गयी।

चाहने लगी फिर वो सीखना,
'माँ' होने के सामाजिक सरोकारों को
और जीना चाहती थी ख़ुद से
अपनी शिराओं में ही
उस भावी डर को एक मर्तबा और
कि जिसके लिए
उसे अभी ही
अपनी उम्र से आगे निकलना था,
और करना था तय
इक संभावित पतिस्थिति के आगे
कैसे उसकी प्रतिच्छाया
लड़कर ही समर्पित हो, 'गर पड़े!

रात की रूह में
आज भी वही डर पसरा है,
ज्यों रात के ही गर्म बिछावन पे
वो आज, ...हाँ आज भी
भक्क् से जागती है,
और स्याह अँधेरे से होकर दो- चार
अपनी उनींदी आँखों में
किसी बेचैन लाचारी की
असह्य पीड़ा लेकर
कसमसाकर सिसकती हुई
ख़ुद को सौंपते हुए
गहरी नींद
सो जाने का सच भोगती है।***
       
        --- अमिय प्रसून मल्लिक.

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

*** आतंक ही है... ***


वो बहुत छोटा था
जब उसकी माँ
उसे अच्छी आयतें पढ़ाती थी...

बड़ी तबीयत से
उसकी बूढ़ी माँ ने
उसे ज़माने की तहज़ीब सिखायी
और सिखाया था
ज़मीन पर पड़ी फ़ालतू चीज़ों से
एक मुक़म्मल ख़ाका खींचना
जिसके संभावित वजूद का
उसे ख़ुद में
कभी कोई इल्म न हुआ. 

उसके ख़यालों से
उठनेवाली हर शिकस्त को
उसकी उसी माँ ने
ख़ून में उसके
कुछ यूँ चस्पा कर रखा था
कि उसकी हर आह
दम तोड़ते- तोड़ते
यकायक ही भभक उठती थी.

वो अपनी माँ का
अकेला बचा अरमान था
और जिसकी मातमपुर्सी
उसे अपने स्याह सपने में भी
कभी मंज़ूर न हुई.

उसने अपनी अकेली जूझती माँ को
कभी अकेले न होने का/ इसलिए भी
भान नहीं होने दिया
कि वो ज़माने से छीनकर
हर वाज़िब ख़ुशी को
अपनी माँ तक लाने की
बेपरवाह क़वायद में
ख़ुद को गोया समेटने निकला था.

उस निरीह माँ की
सिमटी हुई साँसों का भी
वो इकलौता जिम्मेवार बना रहा
और रही उफनती हुई
उसके अपने वजूद में
वही खुरदरी सी अकुलाहटें,
जिन्हें वो क्या
कोई माँ कहीं सींचती नहीं
और नहीं चाहती
अपनी कोख का
जीते- जी कोई हवन- सा करना.

ज़मीन से सपने चुनते हुए
वो अब बारूद की ढेर पर
अपने आप में
इक सुलगता सवाल हो गया है.
वो जान लेकर ही
ख़ून और उसके रिसते रहने का
चिरकालिक मर्म देखेगा
और जिसकी सुखभ्रांति में
वो अपनी माँ की
नाभि से अपरा के विच्छेद को
समझ जाने की
भयावह सीख जनेगा.

हाँ, यहीं आतंक है,
माँ के पेट से निकले
उस ख़ूबसूरत सच का,
जिसे कोई माँ
चीख- चीखकर भी
किसी आवेश में पैदा नहीं करती. ***

             
--- अमिय प्रसून मल्लिक.