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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

*** ...फिर सवाल अहम हुए ***


उसने प्यार को
बहुत क़रीब से देखा
उसके 'होने', न 'होने' पर
तभी कई सवालों को मंज़ूर किया।

उसने कई बार
प्यार में रोज़ लिखी जाने वाली
नयी कविताओं को समझना चाहा
और मुलाक़ात के सारे वायदों को
मन की डायरी में
चाहा शिद्दत से उकेरना,
पर हज़ारों अनसुलझे लफ़्ज़ों से सजे
उसे बस मायूसी के खुले लिफ़ाफ़े ही मिले।

वो प्रेम करके ही
इसमें मिलनेवाले किसी दर्द का ख़ाका
किसी के साथ खींच पायी,
और जो किसी के वश में कभी न हो पाया
उस अजीब एहसास में मिलकर अकेली इतरायी भी।

वो प्रेम- दरिया के
उस किनारे पर अब खड़ी थी
जहाँ मुक़म्मल रास्तों का
हर सवाल बेईमानी बन जाता है।
वो तो झूठ में भी
किसी नैसर्गिक रिश्ते की बीज बो चुकी थी
और समय के गर्भ से
कथित प्यार की कोई निशानी जनने की
सैकड़ों उम्मीद लिये फिर रो पड़ती थी।

उसने प्रेम में
असंख्य असह्य आँसू लिये
समय की क़ैद होती अजनबी आयतों में
कभी न फिर प्रेम करने की
नयी- नयी आज इबारतें जोड़ दी हैं।***

                  - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** और जो बदल गया ***



तुम जब शहर की ओर जा रही थी
मैं वहीं
अपने घर में बेसुध पड़ा रहा।

मैं रहा मशगूल,
मुझे मेरी ख़्वाहिशें समेटनी थीं
और एहसासों के तूफ़ान से
निकाल के
जी लेनी थीं कई अबूझ ज़िन्दगियाँ।
मैं डूबा हुआ था,
तब भी उन्हीं वायदों के भरम में
जिनसे मेरी साँसों में
कभी कोई ज़िन्दा रवानी तुमने भरी थी।

यूँ तो
तुम्हें लौटकर आ जाना था
अपने ही किसी मुक़म्मल पहलू में
कि भूल जाना था फिर
कभी न छूटने वाले बेपरवाह ख़यालों को,
प्रेम- बगिया की गढ़ी चहारदीवारी को
जहाँ मेरा, तुम्हारा, हर किसी का
प्रेम, 'गर हो
रोज़ ही भभककर जवाँ होता है।

तुम फिर,
जाने क्यों आकर भी नहीं आ पायी
और मैं ठगा- सा
सारी संभावनाओं को टटोलने में रह गया,
मैं उलझ गया तब
प्रेम और प्रेम में मिलनेवाली उम्मीदों के
वैसे ही किसी अजनबी और उन्मादी नये शहर में
और मुझे सब कुछ भुला दिया जाना
हर तरह से जायज़ लगने लगा।

कुछ भी
बदल जाने की सारी नाउम्मीदी के बीच,
हो गया फिर हर सवाल सशंकित,
बदल गया हूँ मैं, तुम
या कि आज
वो झूठा समय बदल गया है!***

                 - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** तुम ***



मैं जब भी गुज़रूँगा
तेरे घर की राह से
ना कोई आवाज़ दूंगा
ना मेरी कोई आह निकलेगी वहाँ
डरता है मेरा मन
आना पड़ेगा मेरे मूक बुलावे पे
तुम्हें बेताबी के साथ !

तेरी चारदीवारी के भीतर
महसूस कर तेरी छटपटाहट ही
सुन ली तुमने मेरी पुकार-
ऐसा मैं समझ लूँगा
चाहे तुम्हारी ये छटपटाहट
पनपी हो उच्छृंखलता की आड़ में
पर मैं तेरी हर कमज़ोरी
समझने का गुमान रखता हूँ !

ना तेरी बंद खिड़की से
और ना ही कभी मन के दरवाज़े से
दिखेगा तुम्हें मेरा ख़ामोश चेहरा
क्योंकि देखने तो वहाँ हमेशा
जाऊंगा मैं तुम्हें
और खोलोगी जिस दिन तुम
अंतर्मन की आँखें अपनी
दिखेगा तुम्हें बस वही चेहरा
जो होगा तेरे ह्रदय के हर पन्ने पर
मौजूद अपनी चमक के साथ
और न जाने किस-किस कण में फिर
पाओगी तुम तस्वीर उसकी !

ख़ुशकिस्मती ना समझना तुम इसे
उस नायाब मायूस चहरे की
मैं माँग लूँगा दुआएं उस चहरे के लिए
जिसे देखने के लिए तस्वीर अपनी
नसीब ना हुआ कोई दर्पण !

फिर, मैं ही आऊंगा
और आता ही रहूंगा
उस राह, सड़क, मोड़, चौराहे, हर जगह पर
तुम तब रहो, ना रहो
तेरी हर छाप कमोबेश तो वहाँ
तेरे 'होने' का मुझे
सुखद भरम दिलायेगी
और मेरा दीवाना मन
चूम लेगा उस धूल कण को ही
पडे होंगे तेरे पैर जिस पर
इक अनजान बेरहमी के साथ !

मान लूँगा तब मैं
कि तुम रहो, ना रहो
तेरी मौजूदगी हमेशा
मेरे पहलू में सिमटी है-
यही इक उम्मीद मन को सुकून देगी
क्योंकि प्यार तो तुम्हारा
हमेशा बँट गया जाने कहाँ-कहाँ !***

            - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** जिसने सब ख़राब किया ***



वो बुरी नहीं थी,
मैंने उसे
जी भरके ख़राब बनाया।

उसने
प्रेम सरीखी किसी चीज़ से पहले
मुलाक़ात नहीं की थी।
मैंने उसे
ऐसे कितने ही रास्ते सुझाए।
कि वो इन पर चलने को
अपनी नयी आबोहवा से
सवाल करने लगी।

उसने तब उन मायनों को भी समझा,
जो आम भाषा में
हम और आप
नहीं समझ पाते हैं कभी।

वो समझने लगी थी फिर
कि उस पर
हज़ारों कविताएँ लिखी जा रही हैं।***

                - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** उन कविताओं का क्या...!***



सुनो न,
मैं आ गयी हूँ
फिर से पास तुम्हारे!

तुमने कहा था,
मैं भरसक नहीं लौटूँगी,
कि जब तक तुम शिद्दत से नहीं पुकारते,
मैंने तब कुछ और नहीं कहा था।

मैं जानती थी,
तुम नहीं समझोगे
तुमसे दूर
मेरे सीने में उठनेवाली बेचैनी को,
और कुछ न कर पाने की
उदास बेबसी को,
सो,
चुप हो जाना ही
तभी मुझे मेरे प्रेम का साक्ष्य लगा।

करो न अब प्यार
लौट तो आयी हूँ मैं फिर वहीं,
बाग़ वही हैं
फूल, कली, पत्ते, तितलियाँ, सड़क, रास्ते, ट्रेन,
मंज़िल सब वहीं हैं,
तुम और मैं भी तो अब वहीं हैं!

इक जो
दिख नहीं रहा कहीं
इन्हीं सबसे चुराए लफ़्ज़ों से
तुम्हारी उन नितान्त कविताओं का सिलसिला है,
जो तुम मुझपर अकसर लिखा करते हो।***

                       - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** यहीं लौट आऊँगा ***


सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा,
मैं तेरा ये शहर कभी नहीं छोड़ पाऊंगा.


मस्तमौला आगाज़ बचपन का हुआ यहीं पे
यहीं जवानी के पहले सपने को मचलते भी देखा,
हँसी-ठहाकों ने अपना कभी डेरा जमाया यहाँ 
यहीं सारी हसरतों को फिर जलते भी देखा.


चाहा था जिसे दिल से, उसे यहीं पर खोया
ना था जो मेरा कभी, उसकी ख़ातिर कितना रोया
मेरे आँसू तक ने हरदम धिक्कारा मुझको,
कैसे इन सबसे कभी नाता तोड़ पाऊंगा!


सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा...

इसी जगह पे किसी ने वादा किया साथ देने का
तमन्नाओं ने महसूस की थी यहीं पर अपनी उठान,
यहीं पर हवाओं ने फिर रुख़ बदलना किया शुरू
ज़िन्दगी के सफ़र में यहीं देखी मनचली ढलान.


लोग सारे अपने क्यों पराए दिखने लगे हैं
रिश्ते वे जज़्बात के क्यों मोल बिकने लगे हैं
दिल मेरा रह- रहकर बेज़ार हुआ जाता है,
कैसे इन मुश्किलों से कभी मुँह मोड़ पाऊंगा!


सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा...

जहाँ हम दोस्तो की जमा करती थी महफ़िल
वही चौराहा आज कितना सूना हो गया है,
यही वो मक़ाम है जहाँ हमने हार ना मानी कभी
आज किसी की आह का वही नमूना हो गया है.


हर कहीं यहाँ फिर भी अपना प्यार रहेगा
टुकड़ों में वो आँखों का सपना बरक़रार रहेगा
जीवन के नए आयाम को कभी तो सुकून मिले,
तभी इन रास्तों को नए रास्ते से जोड़ पाऊंगा.


सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा,
मैं तेरा ये शहर कभी नहीं छोड़ पाऊंगा.***

- ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** कुछ ऐसे हालात रहे ***



रात में ही
तुम पर लिखी जा सकती हैं
असंख्य कविताएँ।

जब
ये अंधेरा घना होगा
मेरे शब्द और हरे होते चले जाएँगे
शायद तभी तुम समझ सको
इनके कहने के
छुपे और जायज़ मायने को।

तुम फिर
अपनी सुबह के घोर उजाले में
दिन के लिखे
सारे ख़तों को बेहिसाब टटोलना
और करना दोहन
उनमें भी पनपी मेरी ख़ामोश कविताओं का।

हमेशा की तरह
मैं इसे भी
तुम्हारी कोई नयी बेरुख़ी मान लूंगा।
योंकि ऐसे हज़ारों ख़त
तुम तक
तो पहुँचे ही नहीं
जो प्यार से तुम पर लिखे गये थे।
और कविताओं का भी
कुछ ऐसा ही रहा हाल भरसक।***

               - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** है न ऐसा? ***



जब तक तुम 'तुम' थी,
मैं 'मैं' बना रहा।

जब मैं और तुम
'हम' बने,
हज़ारों नये सपने आ बसे।

पर जो सांसारिक प्रेम में सम्भाव्य था,
पहले कुछ ज़रूरतें आईं,
ख़ुद्दारी, चाहतें, शौक, उम्मीदें
सब भभक- भभककर फिर अपनी- अपनी जगह जगे
और जो नहीं होना था,
इन सारे अघोषित आंदोलनों में हमने
प्रेम को अनजाने ही
बेरहमी से शूली पर चढ़ा दिया।

हाँ,
दूर से आनेवाली कुछ आवाज़ें
अकसर हसीन होती हैं
नज़दीकियां जो
सिमट के सैकड़ों दमित भाव बन जाए,
हमारे ही
अहम के किले पर
वो फिर पताका- सा लहराने लगता है।***

                 - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** ...और मैं लिपटी रही ***


तेरी ग़ैरमौजूदगी में
कुछ ऐसी भी गुज़री हैं
मेरी कई सर्द ख़ामोश रातें
कि रुई के
बेपरवाह नर्म फाहों- सी
तेरे एहसास से ही मैं लिपटी रही।

जब पहली दफ़ा
तुम स्याह रात की सफ़ेद चाँदनी में
कभी बलखा के आए
मैं सहमती हुई अपने सारे ख़्वाब
सिरहाने लिए सोयी थी,
खोयी हुई थी मैं
तब तुम्हारी ही कोई ज़िन्दा जुस्तजू लेकर।

तुम आये
आकर मुझे हज़ारों रंगीन लम्हे दिये,
और मुहब्बत में डूबे
तुम्हारे दिलकश साथ को जिया।
तुमसे ही फिर
हज़ारों मौजूँ लफ़्ज़ माँगकर
मैं उधार की
कई कविताएँ लिखने लगी।

मुहब्बत ने कभी
तुम्हें छूकर क्या आज़माना चाहा
मैं तुम्हें
दूर तलक फिर कहीं ढूँढ नहीं पायी,
तुमने तो दुनिया को
अपनी नज़रों से देखने के रास्ते चुने,
और तुम चले गये
किसी लौटती पुरबाई की तरह,
मैं प्रेम में ठगी
वहीं अपनी दुनिया के निशान खोजती रही।

मैं मुहब्बत को
जी भरके जीना चाहती थी,
सो, तुमसे मिली
सारी वर्जनाएँ तोड़ देनी थीं मुझे,
पर मिल जाने की
सारी चाह मेरी रुसवा हो गयीं,
यूँकि तुमसे इतर,
तुम्हारी लगायी बंदिशें कभी भरम नहीं बनीं। ***
                - ©अमिय प्रसून मल्लिक

***तुम पर 'गर न लिखी जाए ***



ये सारी कविताएँ
कैसे
कोई कविता हुई!

जब तक तुम
आकर इन्हें पढ़ नहीं लेतीं
और फिर कमोबेश
मेरे बेबुनियाद साथ की तरह
इनमें कोई
वाज़िब कमी नहीं निकाल देतीं!

कहो,
ये कौन सी कविता हुई
जो 'तुम' पर लिखी ही नहीं गयी,
और
जो कुछ लिखी गयीं
वो तुम्हें छूकर अपने मायने नहीं दिखा पाए!

तुमसे इतर,
कैसे किसी ने कभी
कोई अपनी कविता लिखी हो भला! ***

             - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** जब उसे देखा था...***



उसके हाथ पे
'अमोघा' लिखा हुआ देखा।

मैं तब सोशल मीडिया पर
नयी- नयी इबारतें गढ़ने में लगा था
मुझे रोज़ नये वाक़ये ख़ुद मिल जाते थे
और मैं शब्दों का तारतम्य बुनने लगता।
फिर क्या हुआ अचानक,
मुझे 'हाथ' की इक तस्वीर दिखी
जिस पर 'अमोघा' लिखा हुआ था
और मैं पशोपेश में पड़ गया।

मैं इसका अर्थ ढूँढने में
बड़ा ही बेचैन- सा रहने लगा,
मुझे कभी- कभी
इस नाम में उस शख़्स की नैसर्गिक चाहतों का दमन दिखा
और कभी
उस शय के अचूक- अपराजित होने का सिलसिला मिला,
मैं इसके अर्थ में फिर और उलझता- डूबता गया।

उसकी वो 'अमोघा' पर मुझे नहीं दिखी,
ऐसा अजीब विषय पर मैंने पहले कभी नहीं गढ़ा था,
नहीं दिखा कभी
उसे अपने ज़ेहन में उकेरने वाले का कोई ग़म या उसकी कोई क्षति,
यों कि
वो रोज़- रोज़ हर जगह कहाँ आ पाती है,
और उसका यकायक चले जाना भी,
उसे अपनी इबारत में ज़िन्दा रखनेवाले के लिए
किसी युग का कभी अवसान नहीं रहा है।

उस शख़्स की
बेलौस दिनचर्या में भी
इस अबूझ नाम का कुछ यों चस्प होना सम्भाव्य रहा है,
कि
उसपर कुछ नहीं कहना भी
ख़ुद में इसका एक पूरा अमिट संसार है।

वो हँसता है, खिलखिलाता है,
घाट पे, बाज़ार में, शहर में, दुकान में, सड़क, फूल, तितली, टैटू में,
जब बिना किसी आस के,
उसके आस- पास ही पूरे वजूद में
इस 'अमोघा' का अपना संसार आ बसता है,
और बिना किसी शिकायत के अकेले
वो उसपर सैकड़ों ख़ामोशी की आयतें पढ़ने लगता है।

'अमोघा' ने उसे जो दिया
वह उसे अपने अन्दर सहेज कर रख चुका है।

मैंने देखा,
उसने अपने हाथ पे
बस एक नाम 'अमोघा' गुदवा रखा है।***

                  - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** क्या लिखूँ तुम पर... ***



जाने क्यों
आज तुम पर
कोई कविता नहीं लिख सकी!

जब भी
तुम पर कुछ कहना चाहा,
या चाहा लिखना
कई अनकही बातें,
ढेरों अनसुलझी कहानियाँ
चलती रहीं
पूरे दिन ही मेरे ज़ेहन औ' ख़यालों में।

कुछ नहीं सूझना भी
तुमपर लिखी जानेवाली
तब कोई कविता- सी लगती है,
फिर सोचती हूँ,
जो कुछ लिखूंगी तुम्हें देखकर,
क्या वो
कोई नयी कविता होगी मेरी!***

              - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** आ क्यों नहीं जाते! ***



मैं अब
कौन- सी कविता लिखूँ,
और तुम पर कुछ कहने को
कहाँ से शब्द टटोलूँ,
'गर तुम
आसपास मेरे मौजूद ही नहीं
और तुम्हारी बेपरवाही
कहीं बेसबब जश्न मना रही हो!

कहो,
तुम मेरे लिए ही,
लौट क्यों नहीं आते अब
अपने नाम- सी
किसी पुरबाई की तरह,
झूमते हुए,
फिर मैं गुज़रती हुई
वहीं कहीं तुम्हारी बाट जोह लूँगी।

तुमसे मिली दूरियों ने
हर तरह से तो
मुझे बेबाक आज़माया है,
योंकि मैंने भी
फिर सब क़रीब से देखा,
जिसकी
कभी कोई तलाश की थी,
वो सारे लम्हे
बस 'तुम' ही में तो हैं।***

          - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** तुम ही पर... ***



यूँ तो
मैं कह सकता था
और भी बहुत कुछ तुम पर।

जाने कितनी ऐसी बातें
जो मैं
ख़ुद से भी
कभी दुबारा नहीं कर पाया,
और उन्हें मैंने
जब अपनी कविताओं में क़ैद करना चाहा,
कहो, कैसे
वे तुम पर लिखी गयीं!

तुम पर
कुछ न लिखना भी
मेरी कविताओं का एक अनसुलझा मर्म था,
कि कुछ न लिखने के लिए
मुझे 'तुम' ही मिली।

तो फिर
मेरे 'लिखने' की अपनी त्रासदी नहीं है
कि मेरी सारी कविताएँ
'तुम' पर लिखी जा रही हैं!***

           - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** 'गर तुम आ सको ***



आओ,
इस तरह से आना
कि आकर न जा सको फिर!

तुमने आने का कहा था
तो
मैं इंतज़ार में रहा
कि तुम नहीं आती तो मैं क्या करता,
करता फूल, पत्ती, हवा, जुगनू से बात
फिर रात को
और घना होने को कहता।

कहता सिसककर
कि दर्द जब तक हरा न हो जाए
प्रेम परवान नहीं चढ़ता
और
दर्द के लौट आने की बात फिर कहकर
ख़ुद से ख़ुद को समझा लेता,
कि
दर्द हो, न हो अन्दर
कुछ लहू- सी बातों का प्रवाह होना चाहिए ज़रूर। ***
               - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** भूलना कहाँ होता...***



तुम्हें कभी याद नहीं किया
कि भूल जाने पर
भरसक ऐसे प्रयोग किये जा सकते थे।

जिन्हें भूल जाने का भय है
वो याद करें
और निभाए अपनी दिनचर्या,
मेरा मन किसी डर के मुग़ालते में नहीं रहता,
फिर क्यों मैं
याद कर लेने के भरम में जियूँ!

कल रात भी
तुम पर फिर एक कविता लिखी है,
पूरी रात अकेला जगकर।

यों मुनासिब है मेरे लिए
याद किये जाने से
कहीं बेहतर
किसी को अपने लफ़्ज़ों में बांध लेना।***

           - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** और मुझे लगता है... ***




तुम्हें पढ़ते हुए
अपने ही शहर से
मैं जाने कब बाहर निकल गया!

जब तक वहाँ रहा,
तुम्हारी यादों के घने साए में,
और मैं प्यार में
इतराकर जीता रहा,
फिर तुमसे दूर हो जाने की
तुमने ही तो
मुझे सैकड़ों फ़िज़ूल वजहें दे दीं।

कहो न,
तुमने अकेले में तब क्या कहा था,
जिसकी अकुलाहट को
आज मैं अकेला ही हर कहीं
हर हाल में जी रहा हूँ?
हाँ, मैं रात के
सुनहरे होते सारे ज़ख़्मों को जीता हूँ,
और तुम्हारी हिचकिचाती मौजूदगी को
मायूस होके भी मना लेता हूँ।

मुझे यक़ीन है,
तुम
कभी तो अचानक आओगी,
जिस तरह तुम्हारी आग मुझमें
रोज़ ही
यकायक भभककर उठती है।***

           - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** क्या लिख रहा हूँ! ***




डरता नहीं मन मेरा
आव्रजन के किसी नियम से
न मेरा प्रेम 
तथाकथित प्रशासन के किन्हीं सख्त उसूलों का
कभी ग़ुलाम ही रहा है।

सो, मैं आऊँगा!
मैं लौट आऊँगा,
हर हाट, गली, सड़क, चौराहे पर
तुम हो, न हो
पर तुम्हारी यादों के जहाँ
इक उम्र तक कभी तो चर्चे रहे हैं।

तुम कहती थी,
मैं बड़ा पक्के इरादे वाला रहा हूँ।
पर तुम्हें मैं कैसे बताऊँ
तुम्हें पा लेने के लिए
मैंने अपनी नाकामियों पर भी कभी झूठे कशीदे पढ़े हैं।
मुझे पता है
यों कि तुम्हें चाह लेने के बाद
फिर मैंने
कभी कुछ क्यों नहीं चाहा!

और अब,
बिना कुछ समझे ही
तुम्हारे ही छुपाए सारे लफ़्ज़ लेकर
ये मैं
कौन- सी कविता लिखने बैठ गया हूँ!***

         - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** फिर बचा क्या है...! ***



अब तेरी
कोई तस्वीर नज़र कहाँ आती,
और कहाँ
तुम्हारी यादों के आने का
कोई सिलसिला बचा हुआ है,
मैं जाने क्यों
तुमसे मिली दूरियों को
फिर भी गले लगाए बैठा हूँ!

यूँ कि तुम
शांत- सहमी- अकेली रातों में
मेरे
वही अनसुलझे लफ़्ज़ बन रहे हो,
और उन्हें
समझ लेने के उसी पुराने गुमान में
फिर रोज़
कोई नयी कविता लिखने बैठ जाता हूँ।

जानता हूँ मैं,
तुम अभी नहीं आओगी
पर तुम्हें पुकारने के
कम से कम,
मैं सिसककर सारे आयाम आज़मा तो लूँगा।

क्या मैं कहीं किसी नए सफ़र में हूँ,
आज ऐसा भी लगा,
पर,
इन सबका प्राप्य क्या है,
बिखरा हुआ तो
मैं तब भी उतना ही था!***

  - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** करूँ क्या मैं! ***



सब कुछ अच्छा लगता है,
जब
तुम्हारे प्यार में जी रही होती हूँ।

मैं रात के इस स्याह अंधेरे में भी
तुम्हारी
मौजूदगी ढूँढने लगी थी,
जानते हुए भी
कि तुम मुझसे हज़ारों मील दूर
मेरी यादों में कहीं
अपनी उलझनों में परेशान होगे
और होंगे
तुम्हारे सारे सपने बेचैन
कि जब तलक तक तुम्हें
मेरी कोई ज़िन्दा निशानी न दिखे।

सको तो रह लो
जितना बेफ़िक्र तुम वहाँ रहना चाहो
आज की पूरी रात ही
यहाँ तुम्हारी यादों से पर रोशन है,
दीए को भी
जो मैंने अभी देखा है
हर उस दीए में बेलौस 'तुम' ही हो। ***

                   - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** कौन नहीं है! ***



और प्रेम कविताएँ लिखते- लिखते
देखो,
मैं ख़ुद प्रेम में आ गयी!

तुम आज
मेरे पास नहीं आ सकते तो क्या,
मेरी इन्हीं रातों के सिरहाने पर
तुम्हारी यादों की
लम्बी कतार बनी हुई है,
और मैं ख़्वाबों में
तुम्हारे साथ को
हरदम जी भरके जीने लगी हूँ।

तुम आओ, न आओ
मेरे पहलू में
तुम्हारी यादों का बेतहाशा
हर रोज़ आना- जाना है,
जो मेरा ये रोग
अब किसी से छुपाए कैसे छुपे!

कि कभी कोई जताता है,
कोई छुपाता है
तो
तुम ही मुझे बताओ
यहाँ प्रेम में भूखा कौन नहीं है!***

              - ©अमिय प्रसून मल्लिक

*** मेरा वक़्त भी ले जाओ... ***



हो सकता है,
हों मेरे एहसास और भी नाहक
मुहब्बत की तेरी

मुझे पहले कभी आदत जो नहीं रही।

डरता नहीं मन मेरा
तुमसे मिली अचानक दूरियों से
योंकि
तुमसे दूर होने के
सारे सम्भाव्य पहले से तय थे
पर तक़लीफ़
इस दिल की
अपनी जगह ग़ैरवाज़िब भी नहीं।

तुम रहो न बेफ़िक्र
दूर वादियों मे बेमन से इतराते हुए
मैं तुम्हें पुकारने के
सारे उपायों को चीख के आज़माऊंगा।

कि रोज़ तुम पर
कोई न कोई कविता ही लिखी जाएगी,
पास लौटकर तुम
मुझसे मेरा जब तक ये वक़्त न छीन लो.***

             

                    - © अमिय प्रसून मल्लिक

रविवार, 4 नवंबर 2018

*** कितनी दूर हूँ...!***


जो समझते हैं
तुम्हारे क़रीब दिखना
मेरी मुहब्बत की निशानी रही है...

मेरे साथ चलते हुए
तुमने
प्यार की जब अमिट निशानियाँ छोड़ीं,
मैं बेपरवाह
तुम्हें जीत लेने की
आज इस नए शहर में भी अकेली ही मुनादी करती रही।
तुम आये तो,
ख़ुश्बू हवाओं में
और भी मदहोश हो रही थीं,
और उन्हें समेट लेने में
मैं खिलखिलाती हुई मानो पागल हुए जा रही थी।

मुझे
पहली दफ़ा छूकर
तुमने प्यार के सैकड़ों अबूझ मायने सिखाए,
और बताया कि
हो सकते हैं कभी भी, कहीं भी हज़ारों रास्ते
मुहब्बत से गुज़रते हुए, मुहब्बत को जताने के,
फिर मैं नज़रें झुकाए, घबरायी- सी तुमसे दूर जाना चाहती रही।

और,
इक अरसे के लिए
तुमसे इतनी दूर आकर भी तो
देखो,
तुम्हारे कितने क़रीब रही हूँ मैं! ***
           - © अमिय प्रसून मल्लिक.

शनिवार, 3 नवंबर 2018

*** जो तुम समझते... ***




कह सकता था,
तुम्हारे चले जाने पर
जाने कितनी ही अबूझ कविताएँ...

तुम होती,
तो लफ़्ज़ों का मिजाज़ भी होता
और
पास सिमट के
हम ज़िन्दगी जिये जाने के सारे हुनर
हँस के आज़माते,
नहीं तो
चुन- चुनकर सहेजे
इन एहसासों में रखा क्या है!

'गर तुम नहीं हो
तो तुम पर लिख दी
फिर हज़ार कविताओं का ही क्या होगा!***
                        
            - © अमिय प्रसून मल्लिक

***...और तुम चले गए ***



मैंने कहा,
प्यार नहीं करते मुझसे,
और तुम चुप रहे!

कहो,
अब जो तुम चले गए हो,
ये शामें
तुम्हारी बातों से सिन्दूरी थीं,
मेरी रातों में जो
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का हरदम पहरा घना रहा,
मेरे ख़ामोश दिन
जो
तुम्हारे मुस्कराने से
खिलखिला उठते थे फाकाकशी में भी,
कहाँ ढूँढूँ अब इन्हें मैं!

जाने आज कितनी दूर चले गए हो,
कब आओगे लौटकर,
जानता नहीं ये मन मेरा,
और
तुमसे अभी भी,
यही कहता है अकेले में ये दिल लाचार- सा,
कह दो, 
कि तुम नहीं जाओगे मुझे छोड़कर!

हाँ,
झूठ तो नहीं कहते कभी तुम,
पर, हो झूठे,
योंकि तुम तो कब का जा चुके हो।***
         
                  - © अमिय प्रसून मल्लिक

*** तुम्हारे जाने के बाद...***



सोचती हूँ,
बहुत कुछ बदल तो नहीं जाएगा!

तुमसे जो
मेरी रातें रोशन थीं,
बेतहाशा परेशान मेरे दिन में
जो तुम
हर पल उजाले जैसे थे,
उनको
मैं यहाँ अब अकेली
इतनी दूर से कैसे सहेजूँगी!

मैं कैसे भूलूंगी,
तुम्हारे साथ गुज़ारा हुआ
सौ- सौ बरस जैसा मेरा
एक भी लम्हा।

लौट आऊंगी फिर मैं,
अचानक,
लगता है, सब कुछ छोड़के
जो तुमसे दूर 'गर गुज़र न सके
सबसे लंबे
मेरे ये अनचाहे दिन।***

       
        - © अमिय प्रसून मल्लिक

*** साथ तुम्हारा...***



मैंने कहा,
अब चाय या कॉफ़ी कुछ लोगी!

जवाब आया,
कुछ नहीं लूँगी,
बस तुम पास बैठे रहो मेरे
मैं देखूंगी तुम्हें।

...चाय या कॉफ़ी ले लेती
तो जाने
क्या- क्या नहीं बन जाती ये! ***

              - © अमिय प्रसून मल्लिक.

*** कहो तो ज़रा...***



उसने कहा,
इधर- उधर न देखो,
बस प्यार करो!

कैसे करते हो कुछ,
क्या- क्या तब
जाने कैसे सोच पाते हो!
अच्छे बुरे की सारी परख
कैसे
अभी ही करते हो!

'प्यार नहीं करते तुम
कि जब
मैं तुम्हारा स्पर्श चाहती हूँ;
तुम
सुरक्षा के सवालों में मशगूल हो जाते हो!' ***

                   - © अमिय प्रसून मल्लिक.

*** 'तुम' ***



कविताएँ,
कभी भी लिखी जा सकती हैं
और उन्हें
पढ़ा भी जा सकता है
देर रात के स्याह सन्नाटे में!

बस,
वे 'तुम' पर लिखी जाएँ।***

            - © अमिय प्रसून मल्लिक

*** मैंने जाने दिया... ***




तुम शहर छोड़कर
जब चली गयी,
मैं निरा अकेला वहाँ सिगरेट की कशें ले रहा था।
मुझे लगा,
तुम्हारे ख़यालों में उलझकर
मैं हर चौक- चौराहे पर अपना एक ठौर बना लूंगा।

तुम्हें 'गर याद होगा,
तब,
जब मैं तुम्हें बिस्तर में क़ैद नहीं करना चाहता था,
और मेरी असंख्य सर्द रातों में
सैकड़ों झंझावात
मुझसे बेपरवाह रूबरू हो रहे थे,
मैंने तुम्हें जाने दिया...

मैंने जाने दिया कि
तेरे प्यार की अंगीठी में बेलौस
तब मेरा वर्चस्व सुलग रहा था,
और
इसी गुमान में हमारी
हज़ारों बेबस अंगड़ाइयाँ भी सेंकी गयीं।
मेरा मूक प्यार तब भी
तुम्हारे फिर नहीं 'होने' के साबूत साक्ष्य को
मिटाने में मशगूल था।

तुम्हारे चले जाने तक मेरी सारी रातें
तुम्हारी ही
बातें करती रहीं,
और तुम्हारे संग हर दिन
कभी न मिटानेवाली यादों का,
अमिट संसार गढ़ता रहा;
मैं तब भी नहीं ताड़ सका,
कि जितनी वर्जनाएँ तुमने संसार के साथ
मिलके रची हैं,
उनमें सिर्फ़ मेरा ख़ामोश प्यार ही क़ैद है।

इस शहर को
कहो, अब हुआ क्या है,
सब वही तो हैं,
फूल, पत्ती, सड़क, तारे, रात, जुगनू,
और जो नहीं है,
वो किसी चौक चौराहे पर कहीं,
तुम्हारी गंध है।
मैं उन्हीं कुछ गंधों के लिए
हर इस जगह को धुआँ- धुआँ- सा करता रहता हूँ
कि मैं आज जितना लज्जित होता जाऊँगा,
तुम सारी वर्जनाओं को तोड़कर
भरसक कोई मुकम्मल जगह बनाती चली जाओगी।

अब आज फिर मैं
तुम्हें अपने शहर में ढूँढ रहा था,
जहाँ तुम लौटकर कभी निभा सको उन्हें
जो मेरी हज़ार रातें
तुम्हारे बेतरतीब वायदों में क़ैद हैं,
पर
यहाँ उसी शहर की हर सड़क पे
तुम्हारे न 'होने' का कभी न मिटनेवाला
सन्नाटा भी पसरा हुआ था,

मैंने जब भी दुबारा प्रेम में पड़ना चाहा।***

                   --- © अमिय प्रसून मल्लिक​.

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

*** जो तुम्हारे पास रहा ! ***




उसूल पानी का
बहना ही अगर होता
जम जाने की फिर
क्या उसकी
कहीं ज़िद होती
देखा तुमने,
यकायक बदल गयी मैं
कि ज़िन्दगी कहाँ किसी की
हरदम
इक खाली मर्तबान रही है।

गिरे परदों के पीछे सही
हाँ, तुम्हारी छाया
कसमसाती रही है,
और बालकनी या
झीनी खिड़कियों से
तुम्हारी तड़प कूदना चाहती है
वही अकेलेपन का
स्वयं में
अनूठा अवसाद भोग के!

तुम्हीं चमकना,
शिथिल होती यादों में
और कभी न मिटनेवाली
सुलगती राख के सहारे
जहाँ
मेरे- तुम्हारे
सारे विवादास्पद मर्म
चिंघाड़ करेंगे
और
तड़पना फिर
उस बेचैन गौरेये की मानिंद
कि जो तुम्हारे पास
मेरे वहम के
आज भी दाने चुग रही है।

यों कि
तुम्हारा अपना रंग भी
एक कालिख है
और रुष्ठ हैं तुम्हारी
अपनी धड़कनें,
जिनका मोलभाव भी
किसी नीलामी का
कोई छद्म आकर्षण नहीं।

मानती हूँ,
ये राख फिर भभकेगी
पर जो उष्णता
भोगी है
कुलाँचे लेते
आज तुम्हारे झूठे अहम् ने,
वक़्त ने हमेशा ही वहाँ
अल्हड़पन के
अविराम पैबन्द लगा रखे हैं।***

   --- © अमिय प्रसून मल्लिक.

बुधवार, 23 मार्च 2016

*** आतुर यादें ***


प्रेमालाप में आतुर
वो बालमन
तब ही
यकायक युवा हो चला था
तुम्हारे संसर्ग मेँ रहकर
जब पहली बार
इक उष्णता महसूस हुई
और हुई थीं,
बेलगाम मन- अश्व को
सँवर जाने की
अकूत इच्छाएँ।

मेरी पहली कविता
तुम थी;
और तुमसे ही दूर रखकर
मैंने सैकड़ों रचनाएँ जनीं।
कविताओं के छद्म मर्म मेँ
मैं भूल गया
तुम पर लिखी जा रही
समस्त रचनाओं का
इक समर्पण होना चाहिए था।

अब जबकि
अपनी टूटती शिराओं में
मैंने तुम्हें
'दूरदर्शन' के सुनहरे दिनों- सा
यादों में ज़िन्दा रखा है,
तो स्याह- सफ़ेद रंगों से
कोई गुरेज़ भी नहीं।

हाँ, लहलहा उठती हैं
मेरे मन की
वो उदास होती घास
जब कोई प्रेम के
असंभाव्य बुलावे में
कहीं भक्क् से याद करता है,
तुम कहो न इनको
ख़ामोशी से;
सब समेटकर इक दफ़ा
ये बाँस बन जाए। ***

       --- अमिय प्रसून मल्लिक.

गुरुवार, 10 मार्च 2016

*** बदलाव ***

आती थी इक चिड़िया
रोज़ ही सवेरे
मेरी बालकनी में
और उसकी चहचहाट से ही
मेरे अख़बार का
हरदम आगाज़ हुआ था।

सैकड़ों ऐसी ख़बरें
जिनसे मेरी दिनचर्या
आहत होती थी
मैं उन्हेँ चाय की चुस्कियों संग
निगल जाने में
यकीन रखता था।

पर जो संभाव्य था,
एक दिन
चील का आना हुआ,
मेरे अख़बार मेँ नहीं,
उस फुदकती चिड़िया के
अकेले अहाते में
और 'चील- हरण' का
ऐसा वाक़या
उसी घिसे- पिटे अख़बार- सी
अपनी जवानी में
मैंने पहली बार पढ़ा।

मैं हैरान हुआ,
और बदलते वक़्त की
स्याह और खूँख्वार नज़ाकत को
समय से स्वीकारने की
अद्भुत कला सीखने में
गर्व से तल्लीन हो गया।

मेरा अख़बार पढ़ना
तब भी ज़ारी रहा,
और फिर न मेरी बालकनी में,
न किसी खिड़की में
उस जैसी किसी चिड़िया की
कोई आहट
कभी सुनी गयी।

हाँ, बदलते वक़्त के साथ
चिड़ियाँ भी
बदल जाती हैं।***

   --- अमिय प्रसून मल्लिक.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

*** अस्पृश्य पद्यांश ***


उसने प्रेम किया था,
या कि उसे प्रेम जैसी
किसी सकुचाती भावना का
पाठ्य में ही भान कराया गया।
उसे अब जो लगता है
वो तब उस अनुभूति से
कुछ और ही अलग था।

जब वो अकेली इन सबमें उलझी
किसी क्षितिज पर
गुत्थियों के सुलझने के
व्यर्थ वहम में थी,
और उसे वहीँ प्रेम सरीखी
किसी वस्तु का
बेसबब पाठ पढ़ाया जा रहा था।

उसने अपने टीचर को देखा,
और उसकी आँखों में
यदा- कदा अट्टहास करती हुई
उसे उसकी अटखेलियाँ दिखीं,
और कभी आर्तनाद करती हुई
उसकी वेदना चुभी
पर जो पनपना ज़रूरी था;
पथ भ्रष्ट होकर भी
वो प्रेम किसी अध्याय में
खोखले वायदों से ज़्यादा
कभी गोचर न हुआ।

वो हैरत में इस दफ़े
इसलिए आयी,
कि उसे अपनी आँखों से
अप्रत्याशित- सा
यह सम्मान मंज़ूर नहीं था
और वो हाजमे की गोली से इतर,
बिना चबाते हुए,
अक्षर को निगलने भर लगी।
यों कि,
उसकी रातें अब वीरान थीं,
और रातों में कोई बात थी।

मिलन- बिछोह की इस पहेली में
वो इक मुक़म्मल उम्र तक
अकेली ही उलझती रही,
फिर उसकी रातें ख़ुद से
न कभी स्याह हुईं
और न दिन के उजास में
ख़ुद से कभी उसने
कोई साक्षात्कार ही किया।
उसके ढेरों रास्ते
चुने उसने अपनी ही रवानियों में
पर उनके सँवर जाने की
हर कोशिश ख़ुद ही
उसकी ज़िन्दादिली लीलती गयी।

चाहने लगी फिर वो सीखना,
'माँ' होने के सामाजिक सरोकारों को
और जीना चाहती थी ख़ुद से
अपनी शिराओं में ही
उस भावी डर को एक मर्तबा और
कि जिसके लिए
उसे अभी ही
अपनी उम्र से आगे निकलना था,
और करना था तय
इक संभावित पतिस्थिति के आगे
कैसे उसकी प्रतिच्छाया
लड़कर ही समर्पित हो, 'गर पड़े!

रात की रूह में
आज भी वही डर पसरा है,
ज्यों रात के ही गर्म बिछावन पे
वो आज, ...हाँ आज भी
भक्क् से जागती है,
और स्याह अँधेरे से होकर दो- चार
अपनी उनींदी आँखों में
किसी बेचैन लाचारी की
असह्य पीड़ा लेकर
कसमसाकर सिसकती हुई
ख़ुद को सौंपते हुए
गहरी नींद
सो जाने का सच भोगती है।***
       
        --- अमिय प्रसून मल्लिक.