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रविवार, 14 अक्तूबर 2007

ग़ज़ल
















मेरे ज़ेहन में उठनेवाले सारे सवालों में मिलना ।
रात- दिन तुम मुझको मेरे ख़यालों में मिलना ॥

मैं हवा हूँ, कर न पाऊँ 'ग़र मुलाक़ात हर रोज़

पलकों के अँधेरे में मिलना, धड़कन के उजालों में मिलना ।

हर पल पसंद है तेरा रुप- श्रृंगार मुझको
बंद ज़ुल्फ़ों में मिलो या खुले बालों में मिलना ।

तेरे संग रहकर ही बदल दूंगा मैं मौसम के मिज़ाज को
तुम बस इठलाती रुत की मस्त चालों में मिलना ।

जब तक हो मुझ पर भरोसा, बेबाक मुझे अपना समझो
सामने मिलो, न मिलो, मेरी यादों के भँवरजालों में मिलना ।***

                              - "प्रसून"

4 टिप्‍पणियां:

mukesh ने कहा…

At this age, if u r writing this style and with use of super urdu word, then what will u do.......after getting experience...........
well done dear..........

lage raho........

tum jindagi ki bahut uchchai tak pahuchoge..........

BEST WISHES!!

रंजू ने कहा…

sundar likha hai aapne likhte rahe ..
best wishes
ranju

ritusaroha ने कहा…

janab............bahut acha likha hai.......sach me maza agaya.......

aanch ने कहा…

mujhko na bhul jaana sanam har roz mere khwabo khyalo me milna.....

shamo me na duub jaun main,mujhko seher se pehle milna....

har roz mere khwabo khyalo me milna........

amiya aisa lagta hai ke ritu aur aap ek hi tarah likhte hai,upar likhi lines kabhi ritu ne likh thi.....

bhut acha likha hai aapne.......