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सोमवार, 22 अक्तूबर 2007

शराब, साकी, मयखाने पर सात मुक्तक.


शराब पी- पीकर साकी हम बड़े हुए हैं
आज मयखाने में शरीफों संग खड़े हुए हैं
सबकी आँखों में देखो इक नश्शा-सा है,
कौन जानता है, सारे-के-सारे मरे हुए हैं!


बोतल संग लिपटकर हम हर बार ज़िन्दा हुए
माना कि अपनों की नज़र में शर्मिंदा हुए
पर मय के साथ सोहबत रही पाक मेरी,
हाँ, शरीफ़ों की नज़र में हरदम गन्दा हुए।


शराब पीने का दौड़ है, पिलाने की ज़रूरत नहीं
अपने फटे दामन दिखाने की ज़रूरत नहीं
ठीक है कि लूट जायेगी इज्ज़त इस यारी में,
राज़ ये किसी को बताने की ज़रूरत नहीं।


तेरी खुशामद पर साकी हमने खूब शराब पी
अपनी छोटी-सी ज़िंदगी की हर रात ख़राब की
कहते हैं कई लोग तेरे मयखाने में ऐसा भी,
अपनी पाक ज़िंदगी हमने यहीं तो जनाब जी।



कफन से मेरा यारां अच्छा रह दोस्तों
इंसान से करके दोस्ती रोता रहा दोस्तों
कब्र में जाकर देखी ये दुनिया तमाम,
यहाँ तो माय पीकर ही सोता रहा दोस्तों!


महफ़िल में जाने कितने खामोश हुए बैठे हैं
तेरी नज़रों को याद कर मदहोश हुए बैठे हैं
आना न इस कदर सर-ए-बज्म आये ज़ालिम
जाने कितने पहले से ही बेहोश हुए बैठे हैं।


साकी जी भरके पिला कि पीने की शाम है
ज़रा सलीके से पिला कि करीने की शाम है
तेरी हर बूँद में हो यूं नशा कि लगे,
बस यार की याद में जीने की शाम है।



- "प्रसून"



[शब्दार्थ: साकी-- शराब प्रस्तुत करनेवाला; नश्षा-- नशा; मय-- शराब]

2 टिप्‍पणियां:

ritusaroha ने कहा…

महफ़िल में जाने कितने खामोश हुए बैठे हैं

तेरी नज़रों को याद कर मदहोश हुए बैठे हैं

आना न इस कदर सर-ए-बज्म आये ज़ालिम

जाने कितने पहले से ही बेहोश हुए बैठे हैं।

in lines par to mazaa aa gaya yaaar.......acha likha hai....

रंजू ने कहा…

साकी जी भरके पिला कि पीने की शाम है
ज़रा सलीके से पिला कि करीने की शाम है
तेरी हर बूँद में हो यूं नशा कि लगे,
बस यार की याद में जीने की शाम है।

बहुत खूब साकी और जाम पर लिखना ख़ुद ही एक नशा है ..बहुत सुंदर लिखा है आपने अमिय !!