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रविवार, 28 जुलाई 2013













   ***  वो रंज तुम्हारा  ***

तुम्हें याद तो होगा
कितने वचन
नहीं निभा पाया मैं
पर हाँ,
मैंने ऐसा करना अब तक
छोड़ा नहीं है.
तुम समझ क्यूँ नहीं पायी
कि मेरे अन्दर का आसमान
तुम्हारे लांछनों के बाण से
बींध- सा जाता है
जब कहती हो तुम
नैन में नीर लिए
कि तुम्हारा स्नेह तो
उस आसमान से भी अनंत है
जिसे अब तक बस
ये संसार ही उतना
व्यापक मानता रहा है.

तुम्हारी वर्जनाओं के आगे
मेरा तुच्छ संसार
खो- सा गया है
अपने मायने ढूँढने को
वो तुम्हारे आँसुओं की धार हो
या तुम्हारे उन्मुक्त संघर्षों का,
सिमटता हुआ मेला
चाहकर भी जिन्हें
भेद नहीं सकते
मेरे प्रज्वलित बाण,
नोक पर जिनकी
तुम्हारे अवसादों की
ज्वाला धधकती रही है,
और जिसपर यह मन- रावण
बस नाउम्मीदी लेकर ही
मूक- युद्ध में
हरदम शामिल रहा है.

तुम्हारे असंख्य स्वप्न
जो चिरकाल से
मेरे ही बनवास में
रहे हैं दम तोड़ते
और जिनका दु:खद विस्तार
अपने होने के भाव को
कसमसाता रहा है,
और अब जनने लगे हैं
अपनी आहट का दर्द
पर, यहाँ का हर संभाव्य
तुम्हारी बंदिशों में भी ढलकर
और अब सिसका न करेगा.

इस जीवन-यज्ञ की हर लपट
मेरे स्वपनों का
ज्वलंत दोहन ही तो है
और मेरा मन- मयूर
चुन- सा गया है
उस शीश- महल में
जहां दायित्वों के द्वेष
मेरे होने से कहीं पहले
मेरी मौजूदगी को
देते रहे हैं चुनौती,
और ये लाचार गाम्भीर्य
घेरता आया है
अपनी मर्यादाओं की
स्वयं परिधि.

मैं तब भी नहीं समझता
की तुम्हारा शावक- मन
क्यूँ रहता है अब भी
इस वीरान वन में लेकर
भौतिकताओं की अनन्त अपेक्षाएँ
जहाँ होते बस हमारे
एक वचन का वो आभास
बन पड़ा था जिसपर
एक गुमान कभी तुझको
कि हाँ, हूँ मैं अकेला
इस छलावे के संसार में
और फिर साथ जिसके
भरने को असंख्य कुलाँचे
पंख तुम्हारे
फड़फड़ा उठे थे अचानक.

पर जब साफ़ होता गया
छद्म भावों का गहरा धुँध
सैकड़ों सवाल फूटने लगे थे
तुम्हारे ही उद्वेलित मन में
पर, नहीं रहेगा यहाँ कभी
किसी और से कोई दर्द
बस, यूँ समझ लेना
ये सब ही स्वयं तुम्हारे
'राम' का रंज रहा है. ***

   --- अमिय प्रसून मल्लिक.