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मंगलवार, 6 अगस्त 2013




 ***  सिसकते एहसास ***


हाँ, मैं नहीं चुका सकी,
क़ीमत,
आपके एहसानों के बोझ की
यूँ कि इसके ब्याज से
तार- तार बिक गया
आपके मूल का भी हिस्सा,
माँ ने जब कहा था
मैं उनके जज़्बातों का ही
एक हिस्सा रही हूँ.

माँ, तुम्हें याद तो होगा,
उस दिन जब
मैं रोते- रोते सो गयी थी
और पापा कैसे हताश- से,
तुमको फटकारा किए
कि तुमने मेरा
अच्छे से
ख़याल नहीं रखा
हुआ क्या था जबकि
अपनी नयी क़लम ही तो
बस खोयी थी मैंने.

मौसी ने मेरे रेशमी बालों में
पहली दफ़ा जब
जूड़ा बनाया था
और मेरे ही हाथों से खींचकर
गुलमोहर की वो कली
ये कहते हुए टाँक दी थी
 जा, अब तू 'माधुरी' बन गयी,
और मेरा बाल- मन,
बल्लियों कूदता हुआ
सहेलियों के बीच
जा पहुँचा था…
सच कहूँ तो उसी दिन
सीखा था इतराना मैंने.

रात को खाते समय
कैसे मैं चिल्ला उठती थी
कि  मुझे चक्कर आता है बहुत
तो मेरे वो नीरीह पापा
'डेटॉल' से बीसियों बार
अपनी हथेलियाँ धोते थे
कि अब भी वहाँ सिगरेट की गंध
जो घुमड़ती रहती थी
और मैं तब जाकर ही
चैन से उनकी
बेबसी निहारती थी
और वो मुस्कराकर मुझे
गले से लगा लेते थे.

इस अह्लादित मन का हर सफ़र
पापा की ही उमंगों से
सींचता रहा था
मैं जब मानने को तैयार न थी
कि माँ का रिश्ता
बेटियों से ही संचालित होता आया है,
और जब समय के पाश में बँधी
हर अनुभव मेरा
मेरे भीतर से ही मुझको
व्यंग्य- बाण से भेदता रहा
तब जाकर ही इस मर्म से
मेरा  साक्षात्कार हुआ
कि माँ होना ही अपने- आप में
दर्द को दर्द से जनना है.

पर इस बेबस जीवन का
हर चीखता संभाग
तुम्हारी ही मायूसियों से पटा हुआ
तुम्हारे पास न होने को
आज कलपता है
और सिसकता भी है पुरजोर
उस टीस को दिए जाने पर
जो एक नारी- मन
अनजाने में
तुम्हारे ही अन्दर
प्रेषित करता रहा था.

अब जब तुमने मुझे
हर छद्म सुख देकर
ख़ुद से दूर भेजने के दुःख को
आस्थाओं के वशीभूत
अनुसरण किया है
और भौतिकताओं के संसार में
सब दे डाला है
समझने- बूझने को
तो अकेला ही मन
एक ईमानदार साहचर्य को
आह भरता हुआ
ख़ुद को थपकी ही देता है
कि जहाँ पापा का वर्चस्व
कभी तुम्हें सताया करने लगा था.

इस मन का हर काव्य
अब शब्दों के आघात से
अतुकान्त ही हो गया है
और अपने नये मायने ढूँढने को
जीवन- युद्ध में
लड़- लड़कर भी
लहूलुहान ही है.

मैं कह तो रही हूँ
कि नहीं चुका सकूंगी
उस क़र्ज़ के बोझ को
जिसके ब्याज से ही मेरा वजूद
अब तार- तार हो चला है
और आलम यह है
कि तेरे मूल के डर से
उनींदी आँखों में भी
वो ख़याल पनपने लगा है
जिसको मेरे शब्द- अश्रु
ये समझते हैं
मान लूँ अब
कि अपने ही घर में
आज मैं
किरायेदार हो गयी हूँ. ***


      --- अमिय प्रसून मल्लिक

2 टिप्‍पणियां:

Agyaat ने कहा…

wo shabd hi nahi hai mere paas, jo mere ehsaas ko is waqt bayaan kar sake. aankhen nam hain, aur apki soch ko salaami dene ko jee chaahta hai. outstanding creation, a different one !

बेनामी ने कहा…

thank you! -- Amiya P. Mullick