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सोमवार, 6 जनवरी 2014

*** मेरा मोल क्या है ! ***



मैं नहीं बदल पाऊँगी
इस गुलदान में अब एक भी फूल,
ऐसा करते हुए भी
जाने क्यूँ इससे
मुझे तुम्हारी ख़ुश्बू
बिखर के गुम जाने का ग़म
सिहरन- सी दे जाता है.


मेरे उद्वेलित मन का हर कोना
तेरी ही मौजूदगी से
तब लिपट- सा जाता है;
और खो- सी जाती हूँ
मैं उन बिखरे हुए ख़यालों में
जहाँ से दूर जाने को
मैंने ही कभी
तुम्हें रास्ता दिया था.


तुम्हें याद ही होगा,
तुमने क्या जताया था मुझपे,
ये बस मेरे साथ की बात है,
जो मैं तुमपे
हक़ जता रही हूँ अपना!
पर ये आज हुआ क्या है
जो तुम न होकर भी
मेरे 'होने' पे
जैसे डेरा जमाए बैठे हो!


कहाँ गए आज तुम्हारे
प्रेम के वो दिव्य- दर्शन
क्यूँ नहीं कह जाते अब
कुछ नहीं समझा सकोगे तुम
जो मैं तेरी ज़िन्दगी में,
बेरहम साँस की तरह
चिरकाल तक,
तेरे संग ही आती- जाती रहूँगी.


आज तुम भले चले गए हो
मैं तेरी यादों में
हर रोज़ ही सिसककर
ख़ुद को फिर से जनती हूँ,
और करती हूँ पैदा
एकाकार होने के उस सम्भाव्य को
जिस एहसास की क़ीमत
मेरे मन के खुले बाज़ार में
आज इतनी ही आकलित है,
जैसे अपने ही पैसों से,
मैं स्वयं बीमित रही हूँ.***


       --- अमिय प्रसून मल्लिक.


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