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गुरुवार, 15 मई 2014

*** चित्रलेखा हो तुम...***





मेरे उन्माद की पराकाष्ठा हो तुम
मेरी मस्ती का हो अथाह समन्दर,
तेरी मादकता का पोषक हूँ मैं
तेरा मौजूँ तूफ़ाँ है मेरे अन्दर.

तू क्या होगी किसी से शासित
तूने तो हर दिल में डेरा जमाया है
बोलती आँखों का तेरी दीवाना हूँ
मुझमें भी तेरा प्रेम समाया है.

मुझे जितना गिराना चाहो, तुम गिरा लो
ये दिल तो गिरने का आदी है,
माना, प्रेम-परीक्षा का है ये दौर
तुझे हर प्रश्न की जो आज़ादी है.

उच्छृंखलता तो ख़ैर प्रवृत्ति है तेरी
मुझको इस पर भी मलाल नहीं है,
हैरत क्यूँ हो तेरी चाहत से मुझको
अपनी प्रेम-परिभाषा का ख़याल नहीं है.

मेरी राह तुझे हमेशा रास न आयी
पर तेरा हर अंदाज़ मुझे मंज़ूर रहा,
क्या खोया, क्या पाया; प्रश्न कहाँ,
विरह वेदना का बस यहाँ दस्तूर रहा.

तेरी चंचलता से कोई क्यूँ न ख़ूब डरे
पर इसमें तेरा कोई दोष नहीं है,
है कसूर जागती निगाहों का बस
यौवन को मादकता का होश नहीं है.

मैं प्रेम- पुजारी कर जाता हूँ इक भूल अकसर
हर शय में तेरी इबादत करने लग जाता हूँ,
न पाकर 'साकार','निराकार' किसी रूप में ज्यों
रो- रोकर फिर आहें भरने लग जाता हूँ.

तेरे ही प्रेम में इसलिए भी जीवन निसार होना है
'गर किसी दिल को तुमने कभी दरकते देखा हो,
यों कि मैं तो रहा हूँ सदियों से तुम्हारा 'बीजगुप्त'
और बेशक, तुम ही मेरी चिरकाल से 'चित्रलेखा' हो.***


--> प्रसंगवश:- 'चित्रलेखा' उपन्यास पर दरकते मन की छोटी- सी बानगी...

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