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रविवार, 22 फ़रवरी 2015

*** तुम्हें जाना है ***


देख लूँ तुम्हें मैं
किसी डूबती साँझ की तरह
इतनी भली- भाँति
कि इसी शहर में कहीं
तुमसे मुझमें
किसी भभकती आग की
कोई लौ मिली थी,
और तुम्हारी जुस्तजू की
फिर चाहत खो गयी थी
उन्माद की बयार में.

यहाँ मन की दीवारों पर
तुम्हारे होने की कई
ज़िन्दा निशानियाँ
अब भी सशक्त भाव से
इन शिराओं में
वैसे ही चलायमान हैं
और उन्हीं शिकस्त
यादों से
एहसासों का पूरा वजूद
आज इक तुम्हारे
बस नाम में सिमट गया है.

होती रही है कई दफ़े
तुम्हारे साथ की
गुमनामियों में चर्चा
और बेशर्त की नाराज़गियों से
तुम्हें मेरे प्रेम की अदालत में
मैंने ख़ुद ही तुम्हें
कई बार जाने क्यों
मुजरिम भी क़रार दिया है!

मन की हर दीवार पे
आज तेरी तस्वीर को
इसलिए मैंने स्याही से
कुछ यों पोत दी है
कि तुम्हारे एहसासों का
हर क़तरा
मेरी साँसों में
कुछ यूँ फड़कता रहे,
कि तुम्हें आज
हमेशा के लिए
अब कहीं चले जाना है.***

           --- अमिय प्रसून मल्लिक.

(Picture courtesy: www.google.com with utmost thanks!)

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (24-02-2015) को "इस आजादी से तो गुलामी ही अच्छी थी" (चर्चा अंक-1899) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

बहुत सुन्दर
मैं भी ब्रह्माण्ड का महत्वपूर्ण अंग हूँ l