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शनिवार, 24 जनवरी 2015

*** बताओ न ! ***




कहाँ कोई पूछता है,
कैसे
प्रेम की गिरहों से
तुम्हें तराशकर निकाला मैंने,
और किस तरह
तेरे समन्दर के गर्भ- गृह से
तुम्हारे उग्र उफान को
किया था क़ैद,
अपनी सशक्त अंजुरि में!

कहो न,
पूछता कौन है अब
हमारी मौजूँ रातों की कहानी
कि जिनके स्याह रंगों में
हमने प्यार की अपनी
घनी और मदहोश,
कभी रवानी लिखी थी!

हम हज़ार राहों में
कभी जहाँ मिलकर चले,
और प्रेम- वेदना को
अपनी आबो- हवा में लपेटकर
उसकी सलामती में
नाहक ही नमाजी बने,
वक़्त की तंग यादों ने भी,
बताओ न,
वहाँ कहाँ कोई,
अपनी उखड़ी साँसें ही संजोयी!

पर यह जानते हुए भी
मिट ही जाएगा इक दिन
इस निष्ठुर बारिश में
प्रेम- पीर का पूरा वजूद,
मैं फिर भी
बेपरवाह चींटियों की तरह
इक उम्र तक
सपनों की बाम्बियाँ गढ़ता रहा.***
          --- अमिय प्रसून मल्लिक.

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-01-2015) को "गणतन्त्र पर्व" (चर्चा-1870) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।

dr.mahendrag ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति मल्लिकजी , एक शेर के माध्यम से अर्ज करना चाहूंगा
किसे फुर्सत है किसी की मुहब्बत में झाँकने को,
मैंने तो देखा बस कि सबके अपने अपने फ़साने हैं