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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

*** तुम कहाँ आओगे...! ***



तुम थे, मैं थी और हवाओं में रवानी थी,
वो बिखरे दिनों की मौजूँ- सी कहानी थी
फ़क़त दिल में लिए कुछ अनसुलझे अरमाँ,
मुहब्बत मेरी रुत थी, रुत आनी- जानी थी.

मिले तुम मुझको, न कभी कोई जैसे मिला हो
तुझमें सिमटकर जीने का नया सिलसिला हो
यूँ फ़लक पे पसरकर भी न कभी जो सँवरा,
तेरी आगोश में सहमकर वो मानो खिला हो.

तेरी यादों की तब रोज़ नयी कहानी बनी थी
तेरी बाँहों में आकर कोई ज़िन्दा रवानी बनी थी
तुम रहे जो बेपरवाह, कहाँ मैं भी मन की,
जीतकर जग से, दोनों की मनमानी बनी थी.

अब मुहब्बत संग सारे वाक़ये बदनाम हैं
जो चुना कभी चहककर, वो लम्हे हैरान हैं
सुलझी रातों में तब कितनी उलझनों पर ठनी,
स्याह- सर्द रिश्तों के आज मुज़रिम इनाम हैं.

जहाँ तेरी यादों की अब अक्सर आवाजाही है
वो बिखरे दिनों की इकलौती बिखरी गवाही है
कहाँ मिलोगे तुम अपने ख्यालों- से चहककर,
दुआओं में ख़ैरियत से, बस तेरी मौजूदगी चाही है.***
                                 --- अमिय प्रसून मल्लिक.



1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (25-01-2015) को "मुखर होती एक मूक वेदना" (चर्चा-1869) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बसन्तपञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'