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गुरुवार, 10 मार्च 2016

*** बदलाव ***

आती थी इक चिड़िया
रोज़ ही सवेरे
मेरी बालकनी में
और उसकी चहचहाट से ही
मेरे अख़बार का
हरदम आगाज़ हुआ था।

सैकड़ों ऐसी ख़बरें
जिनसे मेरी दिनचर्या
आहत होती थी
मैं उन्हेँ चाय की चुस्कियों संग
निगल जाने में
यकीन रखता था।

पर जो संभाव्य था,
एक दिन
चील का आना हुआ,
मेरे अख़बार मेँ नहीं,
उस फुदकती चिड़िया के
अकेले अहाते में
और 'चील- हरण' का
ऐसा वाक़या
उसी घिसे- पिटे अख़बार- सी
अपनी जवानी में
मैंने पहली बार पढ़ा।

मैं हैरान हुआ,
और बदलते वक़्त की
स्याह और खूँख्वार नज़ाकत को
समय से स्वीकारने की
अद्भुत कला सीखने में
गर्व से तल्लीन हो गया।

मेरा अख़बार पढ़ना
तब भी ज़ारी रहा,
और फिर न मेरी बालकनी में,
न किसी खिड़की में
उस जैसी किसी चिड़िया की
कोई आहट
कभी सुनी गयी।

हाँ, बदलते वक़्त के साथ
चिड़ियाँ भी
बदल जाती हैं।***
   --- अमिय प्रसून मल्लिक.

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-03-2016) को "आवाजों को नजरअंदाज न करें" (चर्चा अंक-2279) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'