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बुधवार, 23 मार्च 2016

*** आतुर यादें ***


प्रेमालाप में आतुर
वो बालमन
तब ही
यकायक युवा हो चला था
तुम्हारे संसर्ग मेँ रहकर
जब पहली बार
इक उष्णता महसूस हुई
और हुई थीं,
बेलगाम मन- अश्व को
सँवर जाने की
अकूत इच्छाएँ।

मेरी पहली कविता
तुम थी;
और तुमसे ही दूर रखकर
मैंने सैकड़ों रचनाएँ जनीं।
कविताओं के छद्म मर्म मेँ
मैं भूल गया
तुम पर लिखी जा रही
समस्त रचनाओं का
इक समर्पण होना चाहिए था।

अब जबकि
अपनी टूटती शिराओं में
मैंने तुम्हें
'दूरदर्शन' के सुनहरे दिनों- सा
यादों में ज़िन्दा रखा है,
तो स्याह- सफ़ेद रंगों से
कोई गुरेज़ भी नहीं।

हाँ, लहलहा उठती हैं
मेरे मन की
वो उदास होती घास
जब कोई प्रेम के
असंभाव्य बुलावे में
कहीं भक्क् से याद करता है,
तुम कहो न इनको
ख़ामोशी से;
सब समेटकर इक दफ़ा
ये बाँस बन जाए। ***

       --- अमिय प्रसून मल्लिक.

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-03-2016) को "हुई होलिका ख़ाक" (चर्चा अंक - 2292) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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रंगों के महापर्व होली की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

रंगोत्सव के पावन पर्व पर हर्दिक शुभकामनायें...