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बुधवार, 20 अप्रैल 2016

*** जो तुम्हारे पास रहा ! ***

उसूल पानी का
बहना ही अगर होता
जम जाने की फिर
क्या उसकी
कहीं ज़िद होती
देखा तुमने,
यकायक बदल गयी मैं
कि ज़िन्दगी कहाँ किसी की
हरदम
इक खाली मर्तबान रही है।

गिरे परदों के पीछे सही
हाँ, तुम्हारी छाया
कसमसाती रही है,
और बालकनी या
झीनी खिड़कियों से
तुम्हारी तड़प कूदना चाहती है
वही अकेलेपन का
स्वयं में
अनूठा अवसाद भोग के!

तुम्हीं चमकना,
शिथिल होती यादों में
और कभी न मिटनेवाली
सुलगती राख के सहारे
जहाँ
मेरे- तुम्हारे
सारे विवादास्पद मर्म
चिंघाड़ करेंगे
और
तड़पना फिर
उस बेचैन गौरेये की मानिंद
कि जो तुम्हारे पास
मेरे वहम के
आज भी दाने चुग रही है।

यों कि
तुम्हारा अपना रंग भी
एक कालिख है
और रुष्ठ हैं तुम्हारी
अपनी धड़कनें,
जिनका मोलभाव भी
किसी नीलामी का
कोई छद्म आकर्षण नहीं।

मानती हूँ,
ये राख फिर भभकेगी
पर जो उष्णता
भोगी है
कुलाँचे लेते
आज तुम्हारे झूठे अहम् ने,
वक़्त ने हमेशा ही वहाँ
अल्हड़पन के
अविराम पैबन्द लगा रखे हैं।***

   --- अमिय प्रसून मल्लिक.

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (22 -04-2016) को "आओ बचाएं अपनी वसुन्धरा" (चर्चा अंक-2320) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'