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रविवार, 15 सितंबर 2013

  
          

                 *** जो सफ़र चाहिए … ***


देख रही थी
घर की खुली खिडकियों से
उस आगमन के
अमूर्त्त एहसास को
जब सुनी थी बरामदे में
तुम्हारी आहट, और
बेमन से ही पर
रसोई में जाके मैं
मुस्करायी थी एक दफ़ा.

तुम्हारे वायदों का
वो समृद्ध संसार
मेरी मौजूदगी के लिए
जब बिछोह लगाए
मेरा संग माँगने आया था
और जीवन के दोराहे पर
मैं इस बदगुमान को जीने लगी
कि तुममें ही अब
छोटा-सा संसार
सिमट जाएगा भरसक
रौंदकर,
अपनी शिखर के विस्तार को.

जीवन आज जिस धुरी पर है
वो  चलता ही है
घिस जाती हैं पर
उसके अन्दर की गोलियाँ
और चौंक भी जाता है ये
बहुत सारी उम्मीदों के
आँसू छिपाकर सिसकने में.
जाने क्यूँ नहीं काम आतीं
चाहे जितने भी नाम दे लो
उन बनावटी दिलासाओं को
जिन्हें इतराकर तुम
मन- स्नेहक कहते रहे हो हमेशा.

उलझनों में लिपटे हुए
अनमने भाव से तुम
क्यूँ चाहते रहे फिर
मेरे छद्म-काव्य को
बेसबब थपथपाना!
ख़ुद बना लूँगी आज
उस सफ़र का ख़ाका मैं
जिसमें उन शब्दों का
वो अप्रतिम तेज
कभी कहीं तो
दिव्यमान होगा।
सच है ये भी
ख़त्म हो चलेगी तब तक
वो जो अब हैं
मेरे अन्दर की
मुमूर्ष उम्मीदें
जिनके वशीभूत तुम्हें
तुम्हारी उलझनों से मैंने ही
साक्षात्कार करवाया था.

मैं कह भी नहीं सकी पर
अपने भीतर के उफ़ान को
कि कैसे
तुम भी बदल से चले
समय की भागदौड़ का
करके अक्षम्य बहाना
और न रख सके
उस गुमान का भी ख़याल
जिसे संजोकर कभी
उस छोर से चली थी
जहाँ मेरी आत्मा
अब तलक सबों को
पोषित ही दिखती है,
पर जिसके स्तब्ध टुकड़े
तुम्हारी बेबसी के
आज असंख्य उपहार बने हैं.

क्यूँ नहीं मान लेते तुम
कि चूक गए हो
उस पीर को दबाने में
जो तुम मेरे ही अन्दर
रह- रहकर करते रहे थे
अंजान लांछ्नाओं से प्रेषित
और जिसका असीम आघात
आज तुम्हारी मायूसियों का
ज्वलंत पर्याय बन गया है.
हाँ, सँवर- से तो गए हैं
उस मन- गुलदान के सारे फूल
जिनके ऊर्वर बीज
मेरे आँसू से सींचकर
कभी तुमने जो बोये थे.

नहीं जा सकती मैं
अब तुम्हारे समृद्ध आकाश में
विचरते हुए
परकटे पंछी की मानिन्द
रास आता है मुझे
धूल- मिट्टी से सना
वो उबड़- खाबड़ रास्ता
हों जिसमें अनगिनत ठहराव
और वो संग भी
जिसके लिए मैं
तुम्हारे ही अन्दर
तड़पती रही इक उम्र तक,
और चाहिए मुझे
उन अंजान रास्तों से गुज़रना
जहाँ दिखें
कुछ आम- से मूर्त्त चेहरे
कि ढूँढ पाऊँ मैं जिनमें ख़ुद को
और पा सकूँ जाते- जाते वो जगह
जहाँ कुछ पल को ही
रुके मेरा सफ़र
और अंजान- सी जगह
बने वो पड़ाव
जिसके बेगानेपन का विस्तार
ख़ुद ही लगने लगे
आज सच में अपना है,
और झूठ है वो
जिसका ख़्वाब लेकर मैं
कभी तुम्हारे साथ
उस सफ़र में निकली थी.

मन की सारी दूरियाँ समेटकर
जो सफ़र आज बना है
उसी टीस से उभरी हैं इसमें
जाने कितनी ही
बेरंग- सी तस्वीरें
चीखते- असह्य अनुभव की,
और जो सच है
कोसों दूर उससे मैं
अब ठगी-सी, सिसककर ही
कर चुकी हूँ आत्मसात
ये एहसास कि
अभी भी तुम्हारे भीतर झाँकने को
देखने होंगे मुझे
कई सारे किलोमीटर प्रस्तर। ***

              --- अमिय प्रसून मल्लिक

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