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शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

 
 
     *** सुनहरे होते ज़ख़्म *** 
बहुत मशक्कत से
वो जमा किये हुए
बस पैसे भर नहीं थे,
किन इच्छाओं की तब
जाने कटौती हुई थी
या कि मन मसोसने का,
वो सबक बन रहा था
जब ज़ेब- खर्च भी मेरा
तेरी बेइंतहा मुहब्बत की
नज़र हो गया था.

आज भी याद है मुझको
हौले से तुम्हारा
उस ख़ुशी को नकारना
कि जिसे अरसे से सहेजकर
मैने तेरे लिए खरीदी थी.
तेरा इन्कार भी तब मानो
सही मायनों में
मेरी ख़ालिस मुहब्बत पर
तेरी मंज़ूरी की
मुहर ही था,
और जिसके उफनते बवंडर में
हम दोनों ही
कशमकश में जी रहे थे.

तुम्हारी बेनूर ज़िन्दगी को
अपनी ज़िंदादिली से हमने
हज़ारों ही रंग दिये,
फ़िर तेरी ही हल्की हँसी ने
सारे रंजो- ग़म को
तार- तार किया था
और खिलखिलाती सी तेरी चहक
मेरे ही आँगन में
कुलाँचें भरने लगी थीं,
भौतिकता को भस्म करके.

यादों की मोटी परत को झाड़कर
आज जब,
ये पन्ने निकालता हूँ...
बड़ी ही शिद्दत से
ये ख़याल पनपता है
कि बहुत कमज़ोर- सी लगी हो भरसक
तुमको मेरे अंगीकार की अंगूठी,
पर आज भी चुंधिया जाती हैं मेरी आँखें
उस गहरे- सुनहरे तेवर से,
गोया, वज़न उस सोने में ही रहा होगा,
जिसे तुम्हें तुम्हारी माँ ने कभी
मेरे पास देकर भेजा था. ***

             --- अमिय प्रसून मल्लिक.

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