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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

मुझे हर भाव धोना है
हाँ, पर आज मैं
तुम्हारी शिकायतों का
पुलिंदा समेट रहा हूँ
और झुठलाते हुए कुछ मिथक
पैदा करना है फिर
उन एहसासों के जहाँ को
कि दुनिया जिन्हें अब तक
अपने जीवट हाथों से
मेरे प्रेमोन्माद की
भ्रांति ही बनाती आई है
और जिसके विनिर्माण की नींव
अपने ठोस धरातल को
आकुल होकर
अरसे से तड़पती रही है.

आज जबकि तुमने
अपने मन-समन्दर की लहरों से
मेरी कश्ती डुबोने का
बेसबब पैदा कर ही लिया है,
वो अप्रत्याशित-सा जज़्बा,
तो इस मन की सारी उर्मिकाएँ
तेरी बंदिशों की परिधि से,
अपने-आप में
दिव्यमान होने लगी हैं.

हो सकते हैं हों
मेरे सारे अवलोकन अपाहिज
और तुम भी कशमकश में होने के
जो अवसाद ढूँढ रही हो
वो मेरा लापरवाही से
तुम्हें समेट लेने का
अब गुमान बन जा रहे हैं.

आओ, तुम्हारी ही चौखट पे
मैं तेरे हर मुक़दमे का
पक्षपातविहीन फ़ैसला कर लूँ
और धो लूँ फिर
हर मलीन संदर्भ को
कि अब आज
तुम्हारे ही समन्दर का,
मुझे पानी बन जाना है.

- अमिय प्रसून मल्लिक

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