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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

*** एहसास जो ज़िन्दा हैं ***



जिस आँगन में मैने तुम्हें
पहली बार देखा था,
वहाँ अब पाषाण में लिपटे
तेरे एहसासों की
एक ज़िन्दा मूरत खड़ी है.

तेरे बेबाक आगमन से,
जो हवाओं में एक
ख़ुश्बू फैलती रही थी
वहाँ तुझसे बदनामियों का
एक पूरा स्याह
आज मातम पसरा हुआ है.

तेरे न होने का कभी
जो तुमने मलाल सौंपा था,
तेरी मौजूदगी से वहाँ
हर संभलते जीवन में
अब एक रुग्ण- बेचैन साँस तड़पती है.

मेरी बदनामियों से
हमारे फ़साने को जो
ज्वलंत शब्द मिलते थे,
तेरे अलंकार से उनमें
मैं जीवन- विन्यास की
रोज़ तिलिस्मी परिभाषा गढ़ता हूँ.

तुम जब थे ही नहीं
मेरी आँखों में तेरा मंज़र ज़िन्दा था,
तेरी किलकरियों से आज
हर सन्नाटे को वहाँ
नयी ज़िन्दगी की सौगात मिली है.

मैं तेरे 'होने', न 'होने' से
जो कभी हैरान न हुआ,
तेरी मुहब्बत से उस एहसास को
मेरे अपनों से छीनकर
तेरी रूह में ही अब रोज़
ज़िन्दादिली से पैदा करता हूँ. ***

        --- अमिय प्रसून मल्लिक.

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