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बुधवार, 20 अगस्त 2014

*** तुमसे ही ये काव्य है ***




छन- छनकर अब,
देखो तुम्हारी
यहाँ अदाएँ आ रही हैं;
और तेरी सारी इच्छाओं के बीच
मैं बड़ा लाचार- सा
तेरे अतीत में
फिर जी लेने की उम्मीद लिए,
उन यादों के बिखरे तिनकों से
इस सर्द होती ज़िन्दगी में
किसी अलाव की जुगाड़ में हूँ.

देखो न,
जब तुमसे मेरी कहानियों का
एक अघोषित संसार लिखा जाना था,
और बीते दिनों की गुज़रती- सँवरती छाप,
तेरी सूनी गली का श्रृंगार रही थी;
तभी तुमने अपनी तंग ज़रूरतों से
वहाँ मुझे मेरा मोल लेकर
इक शूल- सा शून्य सौंपा,
पर तब भी तेरी नादानियों को,
अपने- आप में हमने
आज सिसककर इक चादर दे दी है.

आज तुम्हारे सुवास से,
मेरा रोम- रोम यकायक जागृत है
कि तुम कहीं मेरी आबो- हवा में
आज इक क़तरा भी कहीं
अपनी ताज़ा पैठ तो नहीं कर रही,
पर जो सच इससे इतर रहा है
तुम यहाँ रहो, न रहो,
तुमसे मेरी प्रौढ़ होती आकांक्षाओं का
तुम्हारे सन्दर्भ में,
हमेशा पुरजोर मर्दन होता रहेगा.

मैं अंतर्द्वंद्वों की मानिन्द,
तुम्हें हमेशा ही,
अपने काव्यों में
घुमर- घुमरकर शब्दों से,
पिरोया ही तो किया हूँ,
और भावों की अबूझ पहेली- सी
तुम्हें ढूँढना चाहा है
शब्दों की सन्नाटे वाली
उसी तन्हा संसार में लिटाकर;
मानो, तुझपे लिखी जा रही,
सभी कविताओं का,
मैं स्वयं में समृद्ध
अतुकान्त छंद ही तो रहा हूँ.***
    
      --- अमिय प्रसून मल्लिक.

(Pic courtesy--- www.andylal.blogspot.com with thanks!)

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