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शनिवार, 3 नवंबर 2018

***...और तुम चले गए ***



मैंने कहा,
प्यार नहीं करते मुझसे,
और तुम चुप रहे!

कहो,
अब जो तुम चले गए हो,
ये शामें
तुम्हारी बातों से सिन्दूरी थीं,
मेरी रातों में जो
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का हरदम पहरा घना रहा,
मेरे ख़ामोश दिन
जो
तुम्हारे मुस्कराने से
खिलखिला उठते थे फाकाकशी में भी,
कहाँ ढूँढूँ अब इन्हें मैं!

जाने आज कितनी दूर चले गए हो,
कब आओगे लौटकर,
जानता नहीं ये मन मेरा,
और
तुमसे अभी भी,
यही कहता है अकेले में ये दिल लाचार- सा,
कह दो, 
कि तुम नहीं जाओगे मुझे छोड़कर!

हाँ,
झूठ तो नहीं कहते कभी तुम,
पर, हो झूठे,
योंकि तुम तो कब का जा चुके हो।***
         
                  - © अमिय प्रसून मल्लिक

5 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 04/11/2018 की बुलेटिन, " दादा जी, फेसबुक और मंदाकिनी “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

anuradha chauhan ने कहा…

बहुत खूब 👌

Pammi ने कहा…


आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 7 नवंबर 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



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रेणु ने कहा…

आदरणीय अमिय प्रसून जी -- बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना लगी मुझे आपकी | यादों से उलझते मन का अदृश्य से संवाद बहुत ही मर्मान्तक है |प्रणाम और सादर शुभकामनायें और दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें |

Digamber Naswa ने कहा…

मन के उलझाव सुलझाव के बीच झूलती सुन्दर रचना ...
बहुत खूब ....